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October 28, 2026

घराट

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सरकारी नौकरी से तीन साल में 3 अफसरों का मोहभंग, उत्तराखंड में प्रशासनिक अफसरों में बढ़ा VRS का ट्रेंड

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उत्तराखंड में सरकारी सेवाओं से अधिकारियों का स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने का बढ़ा ट्रेंड, लंबी हुई फेहरिस्त, जानिए अबतक कौन-कौन ले चुके VRS. रिपोर्ट- नवीन उनियाल.

देहरादून: देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवाओं में शुमार अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों का समय से पहले नौकरी छोड़ना उत्तराखंड में चर्चा का विषय बन रहा है. बीते तीन सालों में वन सेवा के तीन अधिकारियों के स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) प्रकरण ने प्रशासनिक व्यवस्था, कार्यसंस्कृति और अधिकारियों की कार्यस्वतंत्रता पर सवाल खड़े किए हैं.

हालांकि, कई बार निजी वित्तीय फायदे को देखते हुए भी अफसर इस व्यवस्था से बाहर निकलना पसंद करते हैं. यहां बात सिर्फ आईएफएस यानी भारतीय वन सेवा (IFS) की नहीं बल्कि, आईएएस यानी भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) की भी है. क्योंकि, लगातार आईएएस भी ऐसा ही कदम उठाते रहे हैं.

भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस सेवा और भारतीय वन सेवा को देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवाओं में गिना जाता है. इन सेवाओं में पहुंचने के लिए अभ्यर्थियों को कठिन प्रतियोगी परीक्षा से गुजरना पड़ता है. चयन के बाद प्रशिक्षण और फिर प्रशासनिक जिम्मेदारियों का लंबा सिलसिला शुरू होता है.

आमतौर पर इन सेवाओं में चयन को करियर की बड़ी उपलब्धि माना जाता है, लेकिन उत्तराखंड में समय से पहले सेवा छोड़ने वाले अधिकारियों के बढ़ते मामले फिलहाल सुर्खियां बने हुए हैं. हाल ही में कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक और भारतीय वन सेवा के अधिकारी साकेत बडोला के स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) के फैसले ने इस चर्चा को एक बार फिर तेज कर दिया है.

पिछले तीन सालों में उत्तराखंड वन विभाग के तीन वरिष्ठ अधिकारियों के मामले सामने आए हैं. इनमें मनोज चंद्रन ने अक्टूबर 2024 में वीआरएस के लिए आवेदन किया. तत्कालीन प्रमुख वन संरक्षक धनंजय मोहन ने जून 2025 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली और अब 2026 में साकेत बडोला ने सेवा छोड़ने का निर्णय सार्वजनिक किया है.

सवाल केवल तीन अधिकारियों तक सीमित नहीं है. इससे पहले भी उत्तराखंड में आईएएस (IAS) और आईपीएस (IPS) अधिकारियों के समय से पहले सेवा छोड़ने के मामले सामने आ चुके हैं. ऐसे में यह जानना जरूरी है कि राज्य में अबतक किन अधिकारियों ने निर्धारित सेवानिवृत्ति आयु से पहले सेवा छोड़ी और उनके फैसलों के पीछे क्या कारण बताए गए.

साकेत बडोला के फैसले से फिर चर्चा में आया मामला: कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक साकेत बडोला ने अक्टूबर 2026 में भारतीय वन सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने का निर्णय सार्वजनिक किया. उन्होंने अपने संदेश में कहा कि कई महीनों तक विचार-विमर्श करने के बाद उन्होंने व्यक्तिगत कारणों से यह फैसला लिया है. उन्होंने अपने सेवाकाल को संतोषजनक बताते हुए प्रकृति और वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में काम करने के अवसरों के प्रति आभार भी जताया.

साकेत बडोला उत्तराखंड में वन विभाग के कई महत्वपूर्ण पदों पर काम कर चुके हैं. वे राजाजी टाइगर रिजर्व के निदेशक भी रहे और बाद में कॉर्बेट टाइगर रिजर्व की जिम्मेदारी संभाली. पिछले साल उन्हें मुख्य वन संरक्षक पद पर पदोन्नति मिली थी. उनके फैसले की चर्चा इसलिए भी हो रही है. क्योंकि, वे ऐसे समय सेवा छोड़ने जा रहे हैं, जब उनके सामने अभी लंबा सेवाकाल (11 साल) बाकी था.

हालांकि, साकेत बडोला ने अपने निर्णय के पीछे व्यक्तिगत कारण बताए हैं. उनके सार्वजनिक बयान में विभागीय दबाव या प्रशासनिक असंतोष को इसकी वजह नहीं बताया गया है. चर्चा है कि वो किसी निजी संस्थान से जुड़ने जा रहे हैं, जिसे वो ज्यादा बड़ी ऑपरट्युनिटी मानते हैं.

धनंजय मोहन ने सेवानिवृत्ति से दो महीने पहले छोड़ी सेवा: वन विभाग में इससे पहले जून 2025 में तत्कालीन प्रमुख वन संरक्षक एवं हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स धनंजय मोहन ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली थी. वे साल 1988 बैच के आईएफएस (IFS) अधिकारी थे और उनकी नियमित सेवानिवृत्ति में लगभग दो महीने बाकी थे. धनंजय मोहन का मामला इसलिए चर्चा में आया, क्योंकि वे प्रदेश के वन विभाग के सर्वोच्च पद पर जिम्मेदारी संभाल रहे थे.

उनका वीआरएस आवेदन 20 जून 2025 को दिए जाने और अगले दिन स्वीकृत होने की खबरें सामने आई थीं. उन्होंने व्यक्तिगत कारणों का हवाला दिया था. वन विभाग के मुखिया का सेवानिवृत्ति से ठीक पहले पद छोड़ना प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बना. इसे एक बड़े रहस्य के रूप में भी माना जाता है, क्योंकि सेवानिवृत्ति से मात्र कुछ दिन पहले उनके वीआरएस का कोई ठोस आधार नहीं दिखाई देता.

BKTC के CEO रह चुके बीडी सिंह भी ले चुके वीआरएस: वीआरएस लेने वालों में एक नाम बीडी सिंह का भी आता है. बीडी सिंह पहले आईएफएस (IFS) अधिकारी थे. जो कि बदरी केदार मंदिर समिति (BKTC) में सीईओ (CEO) के पद पर लंबे समय तक रहे और बाद में उन्होंने वीआरएस ले लिया.

मनोज चंद्रन के मामले में वीआरएस से ज्यादा चर्चा प्रक्रिया की: अक्टूबर 2024 में आईएफएस (IFS) अधिकारी मनोज चंद्रन ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए आवेदन किया था. उस समय वे मुख्य वन संरक्षक के पद पर तैनात थे. उनके मामले में वीआरएस की मांग के साथ विभागीय जांच और आरोपपत्र का विषय भी चर्चा में रहा.

तत्कालीन प्रमुख सचिव वन आरके सुधांशु ने ईटीवी भारत से बातचीत में आवेदन मिलने की पुष्टि की थी. उन्होंने बताया था कि अधिकारी के खिलाफ आरोप पत्र जारी किया गया था और मामले की जांच चल रही थी. विवाद पदोन्नति और नियमितीकरण से संबंधित निर्णयों को लेकर था.

मनोज चंद्रन ने इन मामलों में नियमों के उल्लंघन के आरोपों से असहमति जताई थी. चंद्रन के मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया. उन्होंने दावा किया कि वीआरएस के लिए निर्धारित नोटिस अवधि पूरी होने के बाद भी उनकी सेवानिवृत्ति और पेंशन से जुड़ी प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी.

IAS और IPS में भी पहले सामने आ चुके हैं ऐसे मामले: उत्तराखंड में समयपूर्व सेवानिवृत्ति की चर्चा केवल वन विभाग तक सीमित नहीं रही है. आईएएस (IAS) और आईपीएस (IPS) अधिकारियों के भी ऐसे मामले सामने आए हैं. इनमें कुछ नाम इस तरह से हैं…

  • पूर्व IAS अधिकारी उमाकांत पंवार का नाम इस सूची में शामिल रहा है. उन्होंने नियमित सेवानिवृत्ति से कई साल पहले सेवा छोड़ दी थी. उनकी पत्नी और पूर्व IAS अधिकारी मनीषा पंवार ने भी बाद में स्वास्थ्य संबंधी कारणों से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली थी.
  • पूर्व IAS अधिकारी राकेश कुमार ने भी निर्धारित समय से पहले सेवा छोड़ी थी. बाद में वे उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष बने. IAS अधिकारी भूपेंद्र कौर औलख और IPS अधिकारी वी. विनय कुमार के नाम भी समयपूर्व सेवानिवृत्ति के मामलों में सामने आए हैं.
  • IAS अधिकारी बीवीआरसी पुरुषोत्तम का मामला भी चर्चा में रहा. उन्होंने पारिवारिक कारणों का हवाला देते हुए वीआरएस के लिए आवेदन किया था, उस समय उनके सेवाकाल में एक दशक से अधिक समय बाकी बताया गया था. उन्होंने अपने गृह राज्य में प्रतिनियुक्ति का विकल्प भी तलाशा था, लेकिन अंतरराज्यीय प्रतिनियुक्ति की प्रक्रिया में बाधाएं सामने आई थीं.
  • स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना के लिए आवेदन करने वालो की फेहरिस्त में आईपीएस (IPS) असीम श्रीवास्तव और रचिता जुयाल का नाम भी शामिल है. जिन्होंने निजी क्षेत्र में ज्यादा बेहतर मौके होने की स्थिति को देखते हुए अखिल भारतीय सेवा से बाहर निकलने का फैसला लिया.
  • 2014 बैच के IPS लोकेश्वर सिंह भी वीआरएस लेने वालों की सूची में हैं. उन्होंने हरिद्वार, देहरादून, बागेश्वर, चंपावत और पिथौरागढ़ में सेवाएं दीं हैं. पौड़ी के एसएसपी रहते हुए अक्टूबर 2025 में उन्होंने इस्तीफा दिया था. संयुक्त राष्ट्र से संबद्ध अंतरराष्ट्रीय संगठन में चयन के बाद उन्होंने यह निर्णय लिया. हालांकि, उनके साथ कुछ विवाद भी जुड़े रहे और एक व्यक्ति की पिटाई के मामले में वह सुर्खियों में रहे जिसमें पुलिस शिकायत प्राधिकरण ने उन्हें दोषी भी पाया.

उत्तर प्रदेश में बतौर IAS कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल चुके रिटायर्ड आईएएस अधिकारी एसएस पांगती बताते हैं कि,

इन मामलों में सभी अधिकारियों की परिस्थितियां एक जैसी नहीं थीं. कहीं पारिवारिक कारण सामने आए. कहीं स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियां और कहीं दूसरे प्रशासनिक विकल्पों की बात कही गई.

क्या प्रतिष्ठित सेवा में बने रहना अब भी पहली पसंद है? अखिल भारतीय सेवाओं में चयन को लंबे समय तक सुरक्षित करियर, सामाजिक प्रतिष्ठा और व्यापक प्रशासनिक जिम्मेदारियों से जोड़कर देखा जाता रहा है, लेकिन समय से पहले सेवानिवृत्ति के मामले यह समझने का अवसर देते हैं कि अधिकारी अपने करियर और निजी जीवन के बीच संतुलन कैसे तय कर रहे हैं?

निजी क्षेत्र में बढ़ते अवसर, पारिवारिक परिस्थितियां, स्वास्थ्य, गृह राज्य में रहने की इच्छा और व्यक्तिगत प्राथमिकताएं ऐसे फैसलों को प्रभावित कर सकती हैं. दूसरी ओर प्रशासनिक जिम्मेदारियों, विभागीय प्रक्रियाओं और कामकाज के माहौल से जुड़े विषय भी ऐसे फैसलों का कारण बन सकते हैं.

सवाल केवल VRS का नहीं, प्रशासनिक व्यवस्था को समझने का भी: साकेत बडोला के फैसले के बाद उत्तराखंड में वरिष्ठ अधिकारियों के वीआरएस का विषय फिर चर्चा में है. मनोज चंद्रन, धनंजय मोहन और उनसे पहले आईएएस और आईपीएस अधिकारियों के मामलों को एक साथ देखने पर यह स्पष्ट होता है कि समयपूर्व सेवानिवृत्ति राज्य के प्रशासनिक इतिहास में नया विषय नहीं है, लेकिन समय के साथ बढ़ रहे यह मामले चिंता जरूर पैदा करते हैं.

वहीं, इस मामले में रिटायर्ड आईएफएस अफसर जयराज अपनी बात दो टूक रखते हुए कहते हैं कि,

फिलहाल, ये मामले बताने के लिए काफी हैं कि अफसरों का अखिल भारतीय सेवा से मोहभंग हो रहा है. वो वित्तीय रूप से ज्यादा बेहतर स्थिति मिलने पर इस प्रतिष्ठित सेवा को त्यागने के लिए भी तैयार रहते हैं. देश की प्रतिष्ठित सेवाओं में चयन जितनी बड़ी उपलब्धि है, उतना ही महत्वपूर्ण यह समझना भी है कि अधिकारी अपना सेवाकाल पूरा होने से पहले बाहर निकलने का निर्णय क्यों लेते हैं.

उत्तराखंड में अब इस सवाल का जवाब केवल चर्चाओं से नहीं, बल्कि ठोस आंकड़ों और तथ्यों से तलाशने की जरूरत है. राज्य के लिए यह चिंता का विषय इसलिए भी है. क्योंकि, प्रदेश में भारतीय वन सेवा से लेकर भारतीय प्रशासनिक सेवा तक में अधिकारियों की कमी है और इस तरह अधिकारियों के सेवा से बाहर जाने की स्थिति में यह कमी और भी बढ़ रही है. खास बात ये भी है कि ज्यादातर अधिकारी वीआरएस के लिए आवेदन करने के दौरान केवल पारिवारिक कारण बताकर अपने इस कदम के पीछे की असल वजह नहीं बताते.

इसके पीछे भी एक वजह यह मानी जाती है कि अधिकारी दूसरे अच्छे विकल्प के कारण अखिल भारतीय सेवा छोड़ने की जानकारी देने पर वीआरएस स्वीकृत नहीं होने का अंदेशा लगा लेते हैं. जबकि, नियमों में स्पष्ट है कि 3 महीने के भीतर ऐसे अधिकारी का वीआरएस स्वीकृत करना अनिवार्य होता है. जब तक कि सरकार के पास ऐसा न करने का कोई ठोस कारण ना हो.

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