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July 16, 2026

घराट

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उत्तराखंड में हरेला पर्व से पहले चर्चाओं में ‘Black Harela’ अभियान, पेड़ कटान पर फूटा युवाओं का गुस्सा

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ऋषिकेश-देहरादून हाईवे पर हजारों पेड़ काटे जा रहे हजारों पेड़, हरेला पर्व से ठीक पहले पर्यावरण प्रेमी और युवाओं ने चलाया ‘ब्लैक हरेला’ अभियान

देहरादून: ऋषिकेश-देहरादून हाईवे पर हजारों पेड़ काटे जाने के मामले में पर्यावरण प्रेमियों ने सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक पर अभियान छेड़ दिया है. इसी को लेकर हरेला पर्व से ठीक पहले पर्यावरण प्रेमियों ने ‘ब्लैक हरेला अभियान’ चलाया है. इसको लेकर भी तमाम पर्यावरण प्रेमी सड़कों पर एकजुट हुए हैं. हालांकि, मामले को लेकर वन मंत्री सुबोध उनियाल ने पर्यावरण प्रेमियों को सीधी नसीहत भी दी है.

एक तरफ हरेला पर्व, दूसरी तरफ कट रहे 3000 हजार पेड़: उत्तराखंड में हरेला पर्व 2026 की तैयारियों के बीच इस बार पर्यावरण संरक्षण को लेकर एक नया अभियान चर्चा में है. देहरादून-ऋषिकेश हाईवे पर प्रस्तावित सड़क चौड़ीकरण परियोजना के तहत करीब 3000 पेड़ों की कटाई के विरोध में पर्यावरण प्रेमियों ने ब्लैक हरेला अभियान शुरू किया है.

पर्यावरण प्रेमी और युवाओं ने चलाया ‘ब्लैक हरेला’ अभियान: हरेला पर्व से ठीक पहले शुरू हुए इस अभियान के जरिए पर्यावरणविद, सामाजिक कार्यकर्ता और स्थानीय लोग सरकार तक अपनी चिंता पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं. विरोध केवल सड़कों तक सीमित नहीं है, बल्कि सोशल मीडिया पर भी बड़ी संख्या में लोग इस अभियान से जुड़ रहे हैं.

उत्तराखंड लंबे समय से जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है. ऐसे समय में विकास परियोजनाओं के लिए बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई लगातार चिंता का विषय बनी हुई है. हालिया विवाद देहरादून-ऋषिकेश राष्ट्रीय राजमार्ग के सात मोड़ क्षेत्र से जुड़ा है, जहां सड़क चौड़ीकरण और फ्लाईओवर निर्माण की योजना के तहत लगभग 3000 पेड़ों को काटा जाना प्रस्तावित है.

परियोजना के लिए पेड़ों का चिह्नीकरण किया जा चुका है और उन्हें हटाने की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है. इस योजना की जानकारी सामने आने के बाद से ही पर्यावरण संगठनों और स्थानीय लोगों ने इसका विरोध शुरू कर दिया था. उनका कहना है कि जिस क्षेत्र में पेड़ों की कटाई की जा रही है, वो पहले से ही पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील है.
विकास परियोजनाओं के नाम पर रौंदी जा रही हरियाली: बड़ी संख्या में पेड़ों के हटने से न केवल हरित क्षेत्र कम होगा, बल्कि स्थानीय जैव विविधता, वन्यजीवों और क्षेत्र के सूक्ष्म जलवायु पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. पर्यावरण प्रेमियों का आरोप है कि सरकार विकास परियोजनाओं के नाम पर हरित संपदा को लगातार नुकसान पहुंचा रही है.
उनका कहना है कि सड़क चौड़ीकरण और यातायात सुधार जैसे कार्य जरूरी हैं, लेकिन इनके लिए ऐसे विकल्प भी तलाशे जा सकते हैं. जिनसे पेड़ों की कटाई कम से कम हो. इसी सोच के साथ उन्होंने ब्लैक हरेला अभियान शुरू किया है. इस अभियान के तहत लोग सोशल मीडिया पर काले रंग के प्रतीक और विशेष संदेश साझा कर रहे हैं. इसके अलावा विभिन्न स्थानों पर पर्यावरण संरक्षण के समर्थन में कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं.

यह आंदोलन किसी विकास परियोजना का विरोध नहीं, बल्कि प्रकृति के संरक्षण की आवाज है. हजारों पेड़ों की कटाई भविष्य की पीढ़ियों के साथ अन्याय होगा. लोगों से अपील की गई है कि ज्यादा से ज्यादा संख्या में इस अभियान से जुड़कर हरियाली बचाने का संदेश दें.“- जगमोहन मेहंदीरत्ता, समाजसेवी

दिलचस्प बात ये है कि यह अभियान ऐसे समय शुरू हुआ है, जब 16 जुलाई से पूरे उत्तराखंड में पारंपरिक लोकपर्व हरेला मनाया जाएगा. हरेला को राज्य में हरियाली, पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक माना जाता है. राज्य सरकार भी हर साल बड़े स्तर पर पौधारोपण कार्यक्रम आयोजित करती है.

लोगों को ज्यादा से ज्यादा पौधे लगाने के लिए प्रेरित करती है, लेकिन पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि एक ओर सरकार हरेला पर लाखों पौधे लगाने की बात करती है, तो वहीं दूसरी ओर विकास परियोजनाओं के लिए हजारों पुराने और बड़े पेड़ों की कटाई की जा रही है. इसी विरोधाभास को उजागर करने के लिए इस बार ब्लैक हरेला मनाने का निर्णय लिया गया है.

क्या बोले वन मंत्री? उधर, राज्य सरकार ने इस पूरे मामले में अपना पक्ष स्पष्ट किया है. उत्तराखंड के वन मंत्री सुबोध उनियाल का कहना है कि पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ विकास कार्यों को आगे बढ़ाना भी आवश्यक है. उन्होंने कहा कि समाज को यह समझना होगा कि इकोलॉजी, इकोनॉमी और विकास तीनों के बीच संतुलन बनाकर ही आगे बढ़ा जा सकता है.
फिलहाल, हरेला पर्व से पहले शुरू हुआ ब्लैक हरेला अभियान प्रदेश में विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की बहस को फिर से तेज कर रहा है. एक ओर सरकार इसे जनहित की महत्वपूर्ण परियोजना बता रही है, तो दूसरी ओर पर्यावरण प्रेमी इसे राज्य की हरित विरासत के लिए गंभीर खतरा मान रहे हैं.
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