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November 3, 2026

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उत्तराखंड में एसटी प्रमाण पत्रों पर उठे सवाल, राज्य स्थापना के बाद जारी हुए सभी सर्टिफिकेट की जांच की मांग

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आरटीआई एक्टिविस्ट और एडवोकेट विकेश सिंह नेगी ने मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन को लिखा पत्र, पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग

देहरादून: उत्तराखंड में अनुसूचित जनजाति (एसटी) प्रमाण पत्रों के जारी होने और उनके आधार पर प्राप्त सरकारी लाभों को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हुआ है. आरटीआई एक्टिविस्ट एवं अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी ने उत्तराखंड में राज्य गठन के बाद जारी एसटी (Scheduled Tribe) प्रमाण पत्रों और उनके आधार पर मिले सरकारी लाभों की उच्चस्तरीय जांच की मांग उठाई है.

एसटी प्रमाण पत्रों पर उठे सवाल: आरटीआई एक्टिविस्ट और एडवोकेट विकेश सिंह नेगी ने राज्य सरकार से मांग की है कि राज्य गठन के बाद 28 नवम्बर 2000 से अब तक जारी सभी एसटी प्रमाण पत्रों की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए. उनका कहना है कि यदि नियमों और संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत प्रमाण पत्र जारी हुए हैं, तो उनके आधार पर प्राप्त नौकरियों, पदोन्नतियों, छात्रवृत्तियों और अन्य सरकारी लाभों की भी समीक्षा होनी चाहिए.

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एसटी प्रमाण पत्रों की राज्यव्यापी जांच की मांग: इस संबंध में विकेश सिंह नेगी ने मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन को पत्र भेजकर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है. उन्होंने कहा कि यह केवल प्रमाण पत्रों का मामला नहीं, बल्कि संविधान, राष्ट्रपति की अधिसूचनाओं, सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों और वास्तविक जनजातीय समुदायों के अधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय है.

एसटी सूची निर्धारित करने का अधिकार राष्ट्रपति को: विकेश सिंह नेगी का कहना है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद-342 के तहत अनुसूचित जनजातियों की सूची निर्धारित करने का अधिकार केवल राष्ट्रपति को है. इस सूची में किसी भी प्रकार का संशोधन, परिवर्तन या नई जाति को शामिल करने का अधिकार केवल संसद के पास सुरक्षित है. राज्य सरकार या किसी अन्य प्राधिकरण को इसमें बदलाव का अधिकार प्राप्त नहीं है.

विकेश नेगी ने सुप्रीम कोर्ट के इस मामले का दिया हवाला: विकेश ने सर्वोच्च न्यायालय के चर्चित स्टेट ऑफ महाराष्ट्र बनाम मिलिंद (2000) मामले का हवाला देते हुए कहा कि अदालत ने स्पष्ट किया था कि अनुसूचित जनजाति सूची को उसी रूप में स्वीकार किया जाएगा, जैसा राष्ट्रपति की अधिसूचना में उल्लेखित है. किसी भी जाति, उपजाति या स्थानीय पहचान को तब तक अनुसूचित जनजाति नहीं माना जा सकता, जब तक उसका स्पष्ट उल्लेख अधिसूचित सूची में न हो.

एसटी प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया की समीक्षा की भी मांग : आरटीआई एक्टिविस्ट नेगी ने आरोप लगाया कि-

देहरादून जनपद के विकासनगर, कालसी, त्यूनी, चकराता और आसपास के क्षेत्रों में वर्षों से एसटी प्रमाण पत्रों के जारी होने को लेकर विवाद की स्थिति बनी हुई है. यदि गलत व्याख्याओं या नियमों के विपरीत प्रमाण पत्र जारी किए गए हैं और उनके आधार पर सरकारी नौकरियां, पदोन्नतियां, छात्रवृत्तियां, मुआवजे, भूमि आवंटन या आरक्षण का लाभ लिया गया है, तो उन सभी मामलों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है. यह मामला केवल देहरादून तक सीमित नहीं है. राज्य के सभी 13 जनपदों में एसटी प्रमाण पत्र जारी किए जाने की प्रक्रिया की समीक्षा होनी चाहिए.
-विकेश नेगी, आरटीआई एक्टिविस्ट एवं अधिवक्ता-

विकेश नेगी ने शिकायतों का जिक्र किया: विकेश का दावा है कि कई मामलों में राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित सूची से इतर नामों अथवा उपजातियों के आधार पर भी प्रमाण पत्र जारी किए जाने की शिकायतें सामने आई हैं. यदि ऐसा पाया जाता है, तो यह संवैधानिक व्यवस्था और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की भावना के विपरीत माना जाएगा.

सामाजिक न्याय को लेकर ये बात कही: विकेश सिंह नेगी ने सर्वोच्च न्यायालय की सात न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ द्वारा दिए गए स्टेट ऑफ पंजाब बनाम दविंदर सिंह (2024) फैसले का भी उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया है कि राज्य सरकारें सामाजिक न्याय के उद्देश्य से उप-वर्गीकरण कर सकती हैं, लेकिन अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति की मूल सूची में नई जाति जोड़ने या नाम परिवर्तन का अधिकार केवल संसद के पास ही है.

जनजातीय कार्य मंत्रालय को भी किया पत्राचार: उन्होंने यह भी कहा कि इस विषय पर राज्य स्तर से केंद्र सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय को पत्राचार किया गया था. मंत्रालय ने भी स्पष्ट किया कि अनुसूचित जनजातियों से जुड़ा विषय संविधान के अनुच्छेद-342 के दायरे में आता है और अंतिम निर्णय संसद के माध्यम से ही संभव है. मुख्य सचिव को भेजे गए पत्र में नेगी ने मांग की है कि वर्ष 2000 के बाद जारी सभी विवादित एसटी प्रमाण पत्रों की जांच कराई जाए. जिन मामलों में प्रमाण पत्र संवैधानिक और वैधानिक मानकों के अनुरूप नहीं पाए जाएं, उन्हें निरस्त किया जाए. साथ ही ऐसे प्रमाण पत्रों के आधार पर प्राप्त सरकारी लाभों की विधिक समीक्षा कर आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए.

अफसर दोषी पाए जाएं तो उन पर हो सख्त कार्रवाई: उन्होंने यह भी मांग उठाई कि यदि जांच में किसी अधिकारी की भूमिका सामने आती है, तो उसके खिलाफ विभागीय, दंडात्मक और आपराधिक कार्रवाई की जाए. इसके अलावा सभी विभागों, विश्वविद्यालयों, आयोगों, निगमों, शिक्षा, स्वास्थ्य, पुलिस, पंचायत और स्थानीय निकायों से ऐसे लाभार्थियों का विवरण सार्वजनिक किया जाए, ताकि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी बन सके. विकेश सिंह नेगी का कहना है कि यह मुद्दा लाखों युवाओं के भविष्य और वास्तविक जनजातीय समुदायों के अधिकारों से जुड़ा हुआ है. उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार इस विषय पर समयबद्ध और प्रभावी कार्रवाई नहीं करती है, तो इस मामले को न्यायालय और राष्ट्रीय स्तर पर भी उठाया जाएगा.

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